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मेरे बारे में
मैं शब्दों में वो ढूंढता हूँ जो अक्सर
खामोशियों में छुप जाते हैं
लिखना मेरा भागना नहीं
लौटना है...
खुद तक
जो बातें कह नहीं पाए,
वे अक्सर सबसे अच्छी,
लिखी जाती हैं.
‘‘


स्वयं से भागना
मैं अक्सर बैठकर ये सोचता हूँ, लोग खुद से इतना डरते क्यों हैं। खुद के साथ दो पल अकेले बैठना, इतना भारी क्यों लगता है? एक लंबी सैर, बस अपने संग, पैर वहाँ तक क्यों नहीं जाते? अकेले घूमकर लौटना, हमें इतना अधूरा क्यों लगता है? शायद हम खुद को खुद से छुपाते हैं— आईने में झाँकने से डरते हैं, कि कहीं सच्चाई दिख न जाए, कि कहीं हम खुद को ही पसंद न कर पाएँ। इसीलिए हम भागते हैं अपने ही साथ से, कोई और साथ चुन लेते हैं— वो साथ, जिसमें हम अच्छे दिखें, जो हमें मिलवाए उस चेहरे से जो हम बनना चा


शोर
रात के तीन बज रहे हैं। खिड़की बंद है, कानों में ईयरप्लग्स हैं, फिर भी दीवार के उस पार का कटर एक तीखी, घिसटती आवाज़ में अंदर तक आ रहा है, जैसे लोहा लोहे को काट रहा हो। नींद तो अब भूल ही जाओ। गुस्सा आ रहा है — पर सिर्फ़ उस आदमी पर नहीं जो मशीन चला रहा है। गुस्सा आ रहा है इंसान के लालच की उस हद पर, जहाँ वो अपने समाज को, अपने आस-पड़ोस को, अपने आस-पास की हर चीज़ को हाशिए पर रखकर सिर्फ़ पैसे के बारे में सोचता है। तभी तो आधी रात को सारे नियम ताक पर रखकर कोई अपना काम पूरा करने में लग


आदर्श बाल विद्यालय समीक्षा - शिक्षा, शिक्षक और हमारा मौन
आधी रात को, जब पूरा वीकेंड एक सीरीज़ देखने में बीत गया... एक अच्छी सीरीज़ आदर्श बाल विद्यालय देखकर जब उठा, तो ख्याल आया शिक्षक, गुरु और हमारे समाज में उनकी ज़रूरत का। शिक्षा, जो वर्तमान में आंदोलन का मुद्दा बनी हुई है... जिसके लिए लाखों बच्चों ने विरोध प्रदर्शन किया... वही शिक्षा, जिसकी बात हमारे देश में बहुत कम होती है और शिक्षक जो हमारे समाज में वैसे हीं कम हैं और उनका सम्मान उनसे भी कहीं ज्यादा कम। कुछ शिक्षक पद पर तो हैं, पर उनका शिक्षा से वास्ता नहीं। और जो सच में अच्छे
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स्वयं से भागना
मैं अक्सर बैठकर ये सोचता हूँ, लोग खुद से इतना डरते क्यों हैं। खुद के साथ दो पल अकेले बैठना, इतना भारी क्यों लगता है? एक लंबी सैर, बस अपने संग, पैर वहाँ तक क्यों नहीं जाते? अकेले घूमकर लौटना, हमें इतना अधूरा क्यों लगता है? शायद हम खुद को खुद से छुपाते हैं— आईने में झाँकने से डरते हैं, कि कहीं सच्चाई दिख न जाए, कि कहीं हम खुद को ही पसंद न कर पाएँ। इसीलिए हम भागते हैं अपने ही साथ से, कोई और साथ चुन लेते हैं— वो साथ, जिसमें हम अच्छे दिखें, जो हमें मिलवाए उस चेहरे से जो हम बनना चा


शोर
रात के तीन बज रहे हैं। खिड़की बंद है, कानों में ईयरप्लग्स हैं, फिर भी दीवार के उस पार का कटर एक तीखी, घिसटती आवाज़ में अंदर तक आ रहा है, जैसे लोहा लोहे को काट रहा हो। नींद तो अब भूल ही जाओ। गुस्सा आ रहा है — पर सिर्फ़ उस आदमी पर नहीं जो मशीन चला रहा है। गुस्सा आ रहा है इंसान के लालच की उस हद पर, जहाँ वो अपने समाज को, अपने आस-पड़ोस को, अपने आस-पास की हर चीज़ को हाशिए पर रखकर सिर्फ़ पैसे के बारे में सोचता है। तभी तो आधी रात को सारे नियम ताक पर रखकर कोई अपना काम पूरा करने में लग
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