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अव्यक्त

मेरे बारे में
मैं शब्दों में वो ढूंढता हूँ जो अक्सर
खामोशियों में छुप जाते हैं
लिखना मेरा भागना नहीं
लौटना है...
खुद तक
जो बातें कह नहीं पाए,
वे अक्सर सबसे अच्छी,
लिखी जाती हैं.
‘‘


बारिश में तुम
तुम्हें बारिश पसंद नहीं… पर बारिश में तुम बहुत पसंद हो। मैंने देखा है तुम्हारे चेहरे पर ठहरी बारिश की बूंदों को— पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों जैसा, जो बस वहीं ठहर जाना चाहती हैं। तुम्हारी हल्की भीगी ज़ुल्फ़ें, जो आकर तुम्हारे गालों पर रुक जाती हैं, मानो अपना रास्ता भूल गई हों। वहीं ठहरकर इंतज़ार करती हैं कि कब तुम उन्हें अपनी उँगलियों से समेटोगी। तुम्हें शायद पता नहीं, पर शहर के जमे पानी से बचते-बचाते जब तुम्हारे पाँव यूँ उछलते हैं, उस चाल में किसी नृत्य की-सी शोभा होती है। और


नाम — हमारी पहचान
कैसा होता अगर हमारे नाम ही न होते? कभी सोचा है ये? शायद समाज में हमारी कोई पहचान भी न होती। "अरे", "सुनो", "ओ" — इन्हीं से काम चल जाता, पर सच बताऊं, इनसे वो बात नहीं बनती जो नाम से बनती है। बचपन में हम अपने सॉफ्ट टॉयज़ तक को नाम दे देते थे, याद है? मैंने तो बड़ा होने के बाद भी नहीं छोड़ा यह आदत — अपने स्कूटर का नाम रखा था "बसंती", शोले से प्रभावित होकर। बेवकूफी लगती है सोचकर, पर सच में — बिना नाम लिए दस-दस किक मरवाती थी, पूरे मोहल्ले के सामने झुक-झुककर पसीना बहाना पड़ता था। औ


पार्क: जहाँ उम्र के दोनों सिरे मिलते हैं
भारत में तीन महीने रहने के बाद जब मैं वापस दुबई आया, तो लगभग पंद्रह दिन बाद आज फुर्सत से अपने घर के पास वाले पार्क तक आया। वही पार्क, जो हममें से ज़्यादातर लोगों के घर के आसपास होता है... पर विडंबना यह है कि वहाँ तक पहुँचने में अक्सर हफ्ते, महीने, और कुछ लोगों को तो साल भर भी लग जाते हैं। भारत में अब पार्क और खुले मैदान प्राथमिकता नहीं रहे। जनसंख्या बढ़ रही है, और बिल्डर सोचते हैं—इतनी ज़मीन में एक और पच्चीस मंज़िला इमारत खड़ी की जा सकती है। शहरों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स पर द
नई रचनाएँ


बारिश में तुम
तुम्हें बारिश पसंद नहीं… पर बारिश में तुम बहुत पसंद हो। मैंने देखा है तुम्हारे चेहरे पर ठहरी बारिश की बूंदों को— पत्तों पर पड़ी ओस की बूंदों जैसा, जो बस वहीं ठहर जाना चाहती हैं। तुम्हारी हल्की भीगी ज़ुल्फ़ें, जो आकर तुम्हारे गालों पर रुक जाती हैं, मानो अपना रास्ता भूल गई हों। वहीं ठहरकर इंतज़ार करती हैं कि कब तुम उन्हें अपनी उँगलियों से समेटोगी। तुम्हें शायद पता नहीं, पर शहर के जमे पानी से बचते-बचाते जब तुम्हारे पाँव यूँ उछलते हैं, उस चाल में किसी नृत्य की-सी शोभा होती है। और


नाम — हमारी पहचान
कैसा होता अगर हमारे नाम ही न होते? कभी सोचा है ये? शायद समाज में हमारी कोई पहचान भी न होती। "अरे", "सुनो", "ओ" — इन्हीं से काम चल जाता, पर सच बताऊं, इनसे वो बात नहीं बनती जो नाम से बनती है। बचपन में हम अपने सॉफ्ट टॉयज़ तक को नाम दे देते थे, याद है? मैंने तो बड़ा होने के बाद भी नहीं छोड़ा यह आदत — अपने स्कूटर का नाम रखा था "बसंती", शोले से प्रभावित होकर। बेवकूफी लगती है सोचकर, पर सच में — बिना नाम लिए दस-दस किक मरवाती थी, पूरे मोहल्ले के सामने झुक-झुककर पसीना बहाना पड़ता था। औ
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